Science Behind Indian Greeting Style

अभिवादन :: संस्कार के साथ विज्ञान भी :: डॉ ललिता गोयल

अस्मिति एकेडमी द्वारा आयोजित वेबिनार मंच के स्वयंमंथन भाग 25 में आज हमारी विशिष्ट अतिथि डॉ ललिता गोयल रहीं। जिन्होंने अभिवादन करने के तरीके और उसके प्रभाव पर महत्वपूर्ण चर्चा की।
राजस्थान के अजमेर शहर की डॉ ललिता गोयल एक चिंतक, विचारक,शिक्षक के साथ साथ प्रेरणादायक व्यक्तित्व भी हैं।

अभिवादन के संदर्भ में उन्होंने बताया कि जब हम दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार मुद्रा में 10 सेकंड के लिए आंख बंद करते हैं तो हमारे हथेलियों में गरमाहट पैदा हो जाती है और यह गर्माहट एक सकारात्मक ऊर्जा का काम करती है। चूंकि यह गर्माहट हमारे अंदर से आती है जिससे हमारा संबंध हमारे मन से जुड़ जाता है फलत: सकारात्मक ऊर्जा का उद्भव हो जाता है। यह ऊर्जा बहुत ही लाभदायक है जिसका सदुपयोग बहुत ही सहज रूप में हमें अक्सर देखने को मिलता है।

“नमस्कार की मुद्रा में हाथों का जोड़ना” का मतलब है योग। सामने जिन्हें हम नमस्कार कर रहे हैं इस मुद्रा से हम स्वत: ही उनसे जुड़ जाते हैं जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है इससे भी आगे जब हम झुककर अभिवादन करते हैं तो हमारी ऊर्जा सामने वाले तक स्थानांतरित होने लगती है और उनमें आशीर्वाद के भाव स्वत: ही उत्पन्न हो जाते हैं। जब परस्पर इस ऊर्जा का आदान-प्रदान होता है तो यह गुणात्मक रूप में परिवर्तित हो जाती है और सकारात्मक माहौल बना देती है।

डॉक्टर गोयल ने आगे बताया कि हमारी हस्त मुद्राएं भी वैज्ञानिक तरीके से काम करती हैं। प्रत्येक ऊंगली का हथेली से छूना भी एक योग है जो कि सकारात्मक ऊर्जा को जन्म देता है और वह ऊर्जा रोग विशेष का उपचार करने में सहायक होती है और संतुलित जीवन प्रदान करती है। इस प्रक्रिया को हम एक तरह से आध्यात्मिक उपचार भी कह सकते हैं जिसमें यह ऊर्जा ३ सीढ़ियों में काम करती है।
१) योग = जोड़ना = ऊर्जा का उत्पन्न होना,
२) उत्पन्न ऊर्जा का सकारात्मक स्थानांतरण होना,
३) ऊर्जा को ग्रहण करना।

“प्रणाम” की ऊर्जा सामने वाले व्यक्ति की आत्मा तक जाती है और गुणात्मक होकर वापस हम तक पहुंचती हैं यह प्रक्रिया ही वास्तव में सत्यम शिवम सुंदरम है।शिवम का अर्थ है कल्याणकारी जब हमारी ऊर्जा हमारे मन तक पहुंचती है तो मन से पूरे शरीर में परिलक्षित होती है और फिर वही ऊर्जा हमारे कार्यों को कल्याणकारी बनाती है तभी “सत्यं शिवं सुंदरं” का भाव सार्थक होता है। वहीं जब ऊर्जा का स्रोत अवरुद्ध होने लगता है तब मूल्यों का पतन और परिवारिक विच्छेदन के परिणाम सामने आने लगते हैं।
चुंकि यह ऊर्जा योग से उत्पन्न होती है परिणामस्वरूप सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक लाभ भी प्रकट होने लगते हैं। यह ऊर्जा हमारे आत्मा से हमें जोड़ती है आत्मा से मन के द्वारा विचारों का प्रभाव बुद्धि तक जाता है जो कि कल्याणकारी कार्य के लिए प्रेरित करता है।

इस योग से हम दूसरों को कैसे जोड़े। इसमें डॉक्टर गोयल का मानना है कि यह सिर्फ आपको करना है आपकी उर्जा स्वत: ही सामने वाले को सकारात्मक बना देगी। हम अक्सर धर्म की गलत व्याख्या करते हैं असल में सही आचरण करना ही धर्म कहलाता है। तो हम अपने आचरण को सुधारें, नमस्कार करें, नमन करें। अपनी उर्जा को उत्पन्न कर सामने वाले व्यक्ति तक स्थानांतरित करें। निश्चित रूप से हमारी सकारात्मक ऊर्जा अपना असर दिखाएगी और हम आसानी से सबसे जुड़ पाएंगे अत: हम अपने नमस्कार के माध्यम से योग करें, सभी से जुड़ें।

डॉ ललिता गोयल ने मंच पर सवालों के जवाब भी दिए उन्होंने कहा कि आधुनिक दिखने के चक्कर में हम पारंपरिक अभिवादन के तौर-तरीकों को छोड़ते जा रहे हैं जिसके कारण सहज और समुचित तरीके से सकारात्मक ऊर्जा समाज में प्रवाहित नहीं हो पा रही है फलस्वरूप मूल्यों का पतन, अलगाव, बोझिल जीवन व अवसाद की समस्याएं उत्पन्न होने लगी है इसलिए हम सब अपनी परंपराओं से जुड़े। अपनी परंपराओं से जोड़ना मुश्किल भी नहीं है क्योंकि वे हमारी जड़ हैं जहां लौट आना सहज है। अतः अभिवादन के महत्व को समझें और सकारात्मक बनें।

अस्मिति एकेडमी अपने वेबिनार मंच पर विविधता के रंग उकेरते हुए अपने अपने क्षेत्र विशेष के पारंगत व्यक्तित्व को आमंत्रित करती है और उनके अनुभवों को सबके साथ साझा करती है।

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