Pregnancy Care through Ayurveda: By Dr. Preethi

अस्मिति एकेडमी के स्वयंमंथन के वेबिनार मंच पर आयुर्वेद भाग 11 पर हमारे आज के विशेषज्ञ रहीं डॉ प्रीति अग्रवाल
डॉ अग्रवाल एक जानी मानी आयुर्वेदिक गाइनेकोलॉजिस्ट है जो जीवन ज्योति आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज,अलीगढ़ में अपनी सेवा दे रही हैं। हमारा आज का विषय था, pregnancy care through Ayurveda.
डॉ अग्रवाल ने बताया कि आयुर्वेद में गर्भ संस्कार एक महत्वपूर्ण संस्कार है जिसमें गर्भधारण के समय भावी माता को अपने साथ साथ, गर्भ में पल रहे शिशु की समुचित देखभाल आहार-विहार का ध्यान रखना होता है। यह समय स्त्री के जीवन का सबसे सुंदर और नाजुक समय है। इस समय भावी मां और परिवारजन इस सोच में रहते हैं कि हमें किस चिकित्सा पद्धति को अपनाएं ताकि मां और शिशु दोनों स्वस्थ आरोग्यवान और सुरक्षित रहें। आयुर्वेद इस संबंध में मजबूत पद्धति है जो कि इस समय शारीरिक मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत बनाने में मदद करती है।
आयुर्वेद में गर्भधारण मां को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए इसका वर्णन बहुत ही अच्छी तरह से किया गया है। कुछ इस तरह से समझ सकते हैं कि गर्भधारण से लेकर जन्म के समय तक का समय शिशु विकार रहित हो, गर्भ में उसकी वृद्धि सामान्य रहे, आसानी से और पूरे समय के साथ जन्म ले, इसके लिए आयुर्वेद में आहार-विहार पर बहुत ध्यान दिया गया है।
१) १से ३ महा में गर्भधारिणी मां का भोजन मधुर, स्निग्ध, शीतल और तरल लेना चाहिए। चूंकि इस समय जी मिचलाना, उल्टी होने से dehydration की समस्या अधिक बनी रहती है जिससे शरीर में दुर्बलता आने लगती है तो उस समय का भोजन मधुर,स्निग्ध,शीतल और तरल होना चाहिए।
२) ४ और ५वें माह में गर्भ stable हो जाता है और अंग प्रत्यंग का निर्माण होने लगता हैं तो भावी माता को प्रोटीन की आवश्यकता अधिक होती है इसलिए दूध,घी, मक्खन के साथ शष्टिक चावल और कुछ मांसाहारी भोजन लिया जाना चाहिए।
३) ६वें माह में गोक्षुर etc औषधियों से medicated घी, मीठा दही लेना चाहिए, क्योंकि इस माह में शरीर में fluid retention बढ़ जाता है।गोक्षुर में diuretic property होने के कारण swelling को घटाता है।
४) ७वें माह में विदारीगंधादि घृत का प्रयोग करना चाहिए।
५) ८वें महा में आयुर्वेद में पंचकर्म में बस्ति का प्रावधान है जो कि उदर का भाग बढ़ने के कारण, कब्ज की शिकायत दूर करने के लिए व normal delivery के लिए सहायक है। इसके अलावा जन्म के समय मां और शिशु दोनों स्वस्थ और सुरक्षित रखने और विषाणुओं से बचाव करने के लिए योनि पिचू भी दी जाती हैं।
गर्भवती मां को आहार में protein, minerals, iron & carbohydrate समुचित मात्रा में और उस देश विशेष के अनुसार, मौसम के अनुसार तथा अग्नि के अनुसार आहार लेना चाहिए।
डॉ प्रीति अग्रवाल ने आगे बताया कि आयुर्वेद के अनुसार गर्भवती महिलाओं को कुछ और बातों पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए जैसे, दांतो की सफाई रखें, स्वच्छ,ढीला, श्वेत वस्त्र धारण करें, कुछ व्यायाम करें, सुगंधित द्रव्य से जैसे-कुष्ठ- जटामांसी को कूटकर उबालकर उस पानी से रोजाना स्नान करें, धूम्रपान ना करें ताकि होने वाला बच्चा स्वस्थ ओजस्वी और निरोगी रहे। गर्भवती महिला के ठहरने का स्थान आरामदायक, खुला हवादार, ज्यादा ऊंचा या नीचे नहीं होना चाहिए उन्हें वैदिक मंत्र भजन जरूर सुनना चाहिए ताकि उसका मनोवैज्ञानिक असर उनके होने वाले बच्चे पर भी पड़े और बच्चा शारीरिक मानसिक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ जन्म ले सके।

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