नारी

सृष्टि की अप्रतिम रचना है नारी।
कोमलता तुझमें अन्तर्हित है सारी ।
है हृदय स्नेह प्रेम का आगार।
अपनी खुशियों को देती है
अपने प्रिय जनों पर वार।
बचपन में माता -पिता का आंगन
फिर पति का घर करती गुलजार।
कोमल हाथों से सजाती सपनों का संसार।
बेटी,बहन, पत्नी ,सखी , मां ,
अनेक रूप हैं तेरे नारी।
वक्त पड़े तो दुर्गा,काली, लक्ष्मी,
सरस्वती का भी है तू ने रूप धारी।
आज की नारी है हर क्षेत्र में गतिमान।
आसमान की ऊंचाइयों को छूने की,
है ली मन में प्रतिज्ञा ठान।
विज्ञान, चिकित्सा, खेल जगत हो,
शिक्षा या विभागों के पदाधिकारी,
हर कार्य सफलतापूर्वक निभाती,
यह देख रही दुनिया सारी।
हमारे समाज के कुछ लोगों को,
यह बात हजम नहीं हो पा रही है।
अबला नारी तो सबला बन गई,
नीचा दिखाने की कोशिश जारी है।
तेरे आत्मबल को तोड़ने के लिए,
शोषण , दुर्व्यवहार,रेप भी की जा रही है।
पर तू हिम्मत कभी न हारना,
तू अकेली भी सब पर भारी है।

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