जीवन है एक पहेली

जीवन है एक पहेली।
सुख-दुख है इसकी सहेली।
ये जीवन खेल है धूप- छांव का।
बचपन, जवानी, बुढ़ापा है पड़ाव इसका।

बचपन हर ग़म से है बेगाना।
जवानी है जोश और मस्ती का पैमाना।
बुढ़ापा अनुभवों का होता खजा़ना।
युवा पीढ़ी इस खजाने का लाभ उठाना।

ये जिंदगी कभी- कभी होती है बेवफा भी।
दे जाती है कभी किसी मोड़ पे दगा भी।
हर किसी के लिए यह एक सी नहीं होती।
कहीं सुखों की सेज , कहीं कांटे भी बोती।

कहीं भूखी व्याकुल आंखें भोजन तलाशती।
कहीं भरी थाली कुत्तों को परोसी जाती।
कुछ सोते महलों में , कहीं रातें सड़कों पे गुजरतीं।
पेट पीठ से चिपका और आंखें हैं रोती।

ऐ महलों वाले अपनी शान पे न तू इतरा।
महल बनाने वाले इन हाथों पर नज़र फिरा।
जिंदगी में हैं आते अनेकों उतार चढ़ाव।
हिचकोले खाती जीवन नैया पार करती बहाव।

जैसे हर शाम के बाद सवेरा है।
हर ग़म के बाद खुशी का इंजोरा है।
जीवन पथ पर हो यदि अपनों का साथ,
दर्द में भी होता सुकून का एहसास।

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