सिर मुंडाते ओले पड़े

सेवानिवृत्ति का समय जब समीप आया,
दिल में नए – नए सपनों ने घर बनाया l
सोचा सारी जिम्मेदारियां अब पूरी हुईं,
सारे बंधनों से अब मैं मुक्त हुई l
सारा आसमाँ अब मेरे लिए खुला है,
उड़ान भरने को अब ये सारा जहां है l
पर ये क्या सिर मुड़ते ही पड़े ओले ,
करोना का कहर सारा जग है झेले l
सारे अरमान और सपने हुए चकनाचूर,
अब तो दिल्ली भी लगे है बड़ी दूर l
आसमाँ तो क्या घरों के द्वार भी हैं बंद,
भूल गए कैसे रहा जाता हैं स्वच्छंद l
उड़ान भरना तो दूर हुए घरों में कैद,
अपनों से भी दूरी रहा दिल को बेध l
जीवन का अलग रूप है समाने आया,
स्वयं को जीवन के सत्य के करीब पाया l
सिर्फ ईश्वर सत्य है बाकी सब मिथ्या,
यह सच और भी उभर कर सामने आया l
बाहुबली मनुष्य भी कितना है असहाय,
गरीब या अमीर सभी हैं कितने निरुपाय l
मूलभूत जरूरतों के लिए कर रहे संघर्ष,
प्रार्थना है सभी सुरक्षित रहें, इसी में है हर्ष l
सरोज

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