वक़्त तेरी कहानी

तेरी कहानी वक़्त तुझे ही है सुनानी
ऐ वक़्त देख तेरे रूप कितने
कभी रसिया कभी छलिया
कहाँ तक ब्यान करूँ हैं ये इतने
हर वक़्त तू बदलता रहा
धूप छाँव की तरह ढलता रहा
नाराज़ नहीं हूँ पर हूँ हैरान
अपनी रफ़्तार के साथ
कैसे मुझे बहाता रहा
कभी वक़्त था चंगा
कभी वक़्त था मंदा
कभी बही शीतल बयार
कभी आयी बारिश की तेज़ बौछार
हंसाया, रुलाया, भिगाया
तुझ से कोई बच न पाया
तेरे आगे चली न कोई मनमानी
तेरी रज़ामंदी में गर्दन पड़ी झुकानी
नहीं है कोई शिकवा
न ही कोई शिकायत
शायद यही है तेरी रिवायत
तू ही बता कब तक यूँ ही नचाएगा
वह वक़्त कब आएगा
जब तू मुझे सुलाएगा
आँख मूँद कब तेरी गोदी सिर रखूंगी
माथा थपथपाते कब
बचपन की लोरी सुनाएगा
तूने ही अपने साँचे में ढाला है
देख बनकर क्या निकला है
हताश नहीं हूँ, निराश नहीं हूँ
पर वक़्त तेरी कहानी
तुझको ज़रूर थी सुनानी।।

वक़्त तेरी कहानी

Tags:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *