आओ बांचे उजालों के खत

आओ बांचे उजालों के खत
आल्हाद की पगडंडी पे ,
उत्सवी ऊर्जा से सरोबार होकर !

नहायें विराट उजास में
शुतुरमुर्गी दायरे तज,छिद्र खातिर
तबियत से उछालो पत्थर !

उत्सवी तितली को
बिठा के झुके कन्धों पे ,
बढ़ चलो तमस तज ज्योति के पथ पर !

मुर्दामन की मिट्टी मे आओ
रोपें संकल्पों की पौध ,
छूलो मन अपनाईयत की रज्जु बुनकर !

देख दग्ध रत्नाकर हिय का
बांध प्रेमिल रामसेतू ,
उठालो अश्रुमुक्ता नयनसीप से झुककर !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *