सर्दी की एक सुबह

घबराहट से उठी आज
क्योंकि देर से उठी आज ।
बाहर झांक कर देखा
अंधेरा छा रहा था ,
सूरज भी अंगड़ाई लेते
अपनी किरण को जगा रहा था ।
उठकर गई बैठ –
आस पास नज़र दौड़ाई
देर है ,पर इतनी भी देर नहीं ।
ज़िंदगी भर जुती रही
कोल्हू के बैल की तरह ,
कर लेगी थोड़ा सा आराम
तो क्या बिगड़ेगा भला?
रिटायर्ड हूँ ,
अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हूँ –
फिर क्यों न परिन्दे की भाँति
उन्मुक्त रहूँ ।
भर एक ऊँची उड़ान
कर ले पूरा अपना अरमान ।
और सोने को लालायित थी
रज़ाई में भी गरमायश थी ।
बस मन को समझाने की गुंजाइश थी ।
पाँव पसार कर फिर
दुबक गयी रज़ाई में
आँख मूँद फिर सो गई
क्योंकि सर्दी की एक सुबह थी।

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