यही एक तमन्ना

काटा अभी तक का जीवन सोच समझकर
हर लम्हा बिताया नाप तोल कर
ठीक ग़लत का रखा हिसाब
फट ना जाए कहीं
बचाकर रखी ज़िंदगी की किताब।
धुँधली आँखों से दिख रहा है
अब इसका पन्ना उधड़ रहा है
सिलने की गुंजाइश कहाँ
काग़ज़ भी हो गया बदहाल
कमज़ोर पड़ता जा रहा है
कब तक रखूँ इसे संभाल।
सफ़े तो भर गए हैं सारे
लिखने की कहाँ जगह पाऊँ
ओह! हाशिये तो अभी ख़ाली हैं
जहाँ भी नज़र दौड़ाऊँ।
कांपते हाथों ने फिर पकड़ी क़लम
अब जो लिखूँ शायद
इससे ज़ख़्मों पर लग सके मलहम।
बची खुची ज़िंदगी के लिए
इतनी जगह काफ़ी है
ख़ूब रंग भर सकूँ इनमें
यही एक तमन्ना बाक़ी है।।

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