क्या खोया क्या पाया

ज़िंदगी में ऐसे भी पड़ाव आते हैं
जब थक – हार बैठ
सोचने पर मजबूर होते हैं –
अभी तक मैंने
क्या खोया क्या पाया ?
यही हिसाब किताब रखने में
ज़िंदगी उधड़ जाती है
खोने और पाने के
व्यापार ने ही जीवन को चलाया ।
इसी लालसा ने
कई बार उठाया गिराया ,
देकर ठोकरें
क्या क्या सबक़ सिखाया
याद नहीं कितनी बार रुलाया ।

निराशा के क्षणों में
खोने और पाने के पलड़ों को तोलती हूँ
कौन बड़ा कौन छोटा
व्यापारियों का जीवन जीती हूँ ।
अधेड़ उम्र में बुद्धि ने समझाया
जो पास नहीं है
वो खोने के लिए ही था
जो पाया है उसे तो संभाल ।
नहीं तो ये भी फिसल जाएगा
हाथ मलते रह जाओगे
दामन में कुछ न आएगा ।

कुछ तो सुधरा है
ज़रूरत है और सुधारने की
सोच में परिवर्तन लाने की ।
क्यों विचारू – क्या क्या खोया
सब कुछ पाया ,केवल पाया है ।
जिसे अपनों का प्यार मिला
उसने भला क्या गंवाया है!
सबसे बड़ा सुख
अपने परिवार में पाया है ।
नाप -तोल कर क्या करना
जितना है उसी में
खुश रहना सिखाया है ।

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