कुछ पल अपने नाम

बाहरी दुनिया की
खिड़कियाँ बंद करके
घर की चारदीवारी में
मैंने बहुत सुकून पाया ।
कान बंद किए ताकि
बाहरी शोर न आने पाए
अब तो बंद कानों से ही
अंदर की आवाज़ सुनी जाए ।

दिखावे की चकाचौंध से
आंखें हटाकर
मन की आँखों को खोल
अद्भुत चैन पाया ।
सुबह सवेरे जल्दी उठ
अंधकार को छँटता देख ,
योग करके,सूर्य नमस्कार द्वारा
उसका आशीर्वाद पाया ।
दिन की शुरुआत कर प्रसन्नचित
मन अति हर्षाया ।

ध्यान आत्मकेन्द्रित कर
शरीर को सबल पाया ।
हो अंतर्मुखी ,आत्मा को
परमात्मा से मिलाया ।
कितनी कम ज़रूरत है
बाह्य दुनिया की
मन यह अब समझ पाया ।
चंद किन्तु सुघड़ सदस्यों से
बना यह सुंदर संसार
मेरे लिए बहुत ही क़ीमती है
मेरा ‘अस्मिति परिवार ‘।

मालूम है यह लक्ष्य
अभी है बहुत दूर
पर ऐसा लक्ष्य बन तो पाया ।
प्रयास जारी है
छोटा सा क़दम उठ तो पाया ।
बाहरी दुनिया को छोड़
कुछ पल अपने नाम कर तो पाया

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