आक्रोश

कोविड ने क्या कहर मचाई
मची चारों तरफ़ तबाही
घर घर दे उठा दुहाई ।
चार दीवारी में बंद
घर पर ही TV पर सुन रहे थे
मरते हुओं का आंकड़ा गिन रहे थे
पीड़ा भी थी और थे भयभीत
बेबस हो कविता लिख रहे थे ।

अपने भी घर में सेंध लगाएगा
हृष्ट-पुष्ट को निगल जाएगा
यह था कल्पना विपरीत ।
कलेजा फट गया
काल गया लील
कब कैसे घुस आया
बनाया साम्राज्य पूरा शरीर ।
अंग अंग हुआ जर्जर
यह कैसी शिथिलता छाई
अच्छा भला मानुष
बन गया एक परछाई ।
दिल फट गया
हाहाकार मच गया
अब कैसे तुझे पाऊँ –
-मेरे भाई ???

यह कैसी विवशता !!
प्रकट करने रोष मन का
उभर रही फिर यह कविता ।

शब्द तो उतर आए काग़ज़ पर
निशब्द दिल को कौन पढ़ पाए
समझ नहीं आता
कैसे ये घाव भर पाए ?
ज़िंदगी में पहले से ही
बिछोह ही बिछोह था
अपने इने गिने रह गए
जिनसे मोह था
सहते गए -सहते गए
पर विधाता अब तो
तेरी लीला भी समझ न आए
इतना सहने की ताक़त कैसे पाएँ ?

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