अन्तिम कश

गर्मी का मौसम,सुबह का वक़्त
हल्की हल्की बूंदाबांदी
बारिश से धुला हुआ पूरा वातावरण
सौंदर्य से भरा हुआ था पूरा प्रकरण
होटल के बाहर टहल रही थी
सुरमई प्रकृति में खोई हुई थी
अनकही अमूक बातें सुन रही थी।

अचानक एक शख़्स दिया दिखाई
न देख कोई बेंच आस पास
होटल की पटरी पर ही बिसात बिछाई
सिर पर टोपी, एक हाथ में सिगरेट
दूसरे में गर्म कॉफ़ी
बैठ side walk के किनारे
गर्म कॉफी की चुस्की लगायी
क़द काठ का ऊँचा लंबा
मार आलती पालती उसने
सिगरेट का कश खींचा
छल्लेदार धुआँ मिला स्वच्छ हवा में
जिसकी गंध पहुँची मेरी भी नसों में
मैंने उससे दूरी बनाई
अपनी रफ़्तार और बढ़ायी।

चूँकि side walk थी गोलाकार
चंद मिनटों के बाद
फिर हुई उसी से मुलाक़ात
मिलते ही नज़रें अभिवादन में
दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहट छायी
इससे पहले धुआँ मेरे पीछे भागे
तेज़ी से बढ़ गई मैं आगे
कुछ विचार मन में कौंधे
बेपरवाह है, कुछ उदास है
शायद किसी का इंतज़ार है
उस पर नहीं अपने पर हंसी आयी
कितनी जल्दी दूसरों को भाँपते हैं
यह सोच मैं सकपकाई।

अगले चक्कर पर जब उसे नहीं पाया
तब मन उस जगह की
रिक्तता को समझ पाया
जाने अनजाने क्यों
किसी पर राय क़ायम करते हैं
क्यों हर किसी को
अपने अक्स में ढालते हैं
होटल की लॉबी में
उसी शाम मिला वही व्यक्ति
बातों बातों में लगा कहने
वो अंतिम कश था मेरा
आज से मैंने सिगरेट छोड़ दी।।

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