वक्त लिखेगा इतिहास

वक्त लिखेगा जरुर एक दिन
पत्थरों पर यह इतिहास
देखा है उसने एक ऐसा दौर
खामोशी ओढ़े सुनसान थे
सड़क चौराहे और गलियां
हाय ! ऐसी बेचैनी देखी नहीं कभी

वक्त लिखेगा कि देखा है
उसमें ऐसा भयावह महायुद्ध
जिसने छोड़ दिए हैं पीछे
अठारह दिन चलने वाले
महाभारत के समस्त कीर्तिमान
जो चला हफ़्तों दर हफ़्तों
जिसमें न कोई पांडव न कोई दुर्योधन था
था तो बस एक महारथी कोविड नाइंटीन

न भूतो न भविष्यति
न देखा न देखना चाहता है वक्त
यह महामारी ,कोरोना
वायरस जो चीन से चलकर
फेफड़ों में जमकर बैठ गया
सम्पूर्ण विश्व को लील गया
कर गया आब ओ हवा बीमार
जर्रे-जर्रे से झाँक रही थी मौत

जनता कर्फ्यू, लोक डाउन ,
सोशल डिसटेन्सिंग कोरेंटाईन ,सेनेटाइजर
जैसे अस्त्र भी न कर पाए
जिसे परास्त
ताली , थाली, शंख ध्वनि ,
से गूंजी पूरी एक शाम
बहुत उम्मीदी थी आवाम
टोर्च की रौशनी भी कर न पाई
उसे पस्त

बड़ा भारी था उसका जोर
हर तरफ बस ‘पोजिटिव’ का था शोर
वक्त सुनाएगा
भरकर आँखों में आंसूं
कैसे सहा उसने यह वज्राघात
जब लील ली कोरोना ने पूरी अर्थव्यवस्था
व्यापार-व्यवसाय रोजगार
सभी लोक डाउन में थे

पेट मगर ….लोक न हो सका
वक्त सुनाएगा वो भी दास्तान
रोजी रोटी की तलाश में
घर से निकले लोग
जिन्दगी की आस में
लौट रहे हैं घर को
खो रहे थे जिंदगियां लोग
बुझे-बुझे से खड़े थे
दर ओ दीवार
महल , अट्टालिकाएँ,
सूनी पड़ी थीं वीथिकाएँ
गिरते कठपुतली से मानव

लिखेगा वक्त
इतिहास के पन्नों पर
कैसे सहमे-सहमे से थे लोग सभी
मानो अभिशप्त हो मानवता
चहल-पहल थी कहीं तो
महज अस्पतालों ,श्मशानों और कब्रिस्तानों में

इस विकराल दौर में भी
कैसे धर्म की अंधी दीवारों में कैद
दरिन्दे सींच रहे थे विष बेल
कर रहे थे वमन
नफरतों की ,
फैला रहे थे मौत का जाल
धरती के भगवानों पर
बरसाए जा रहे थे रोड़े
मति मूढ़ वो अपनी रक्षा की
लांघकर लक्ष्मण रेखा
जीवन से कर रहे खिलवाड़
मानवता हो रही थी जिनसे तार-तार
वक्त लिखेगा उनका भी इतिहास
इन्सान ही नहीं
आहत था पशु समाज भी

वन्यजीव भी थे परेशान
चिड़िया घरों में जब छा गया सन्नाटा
सोच रहे हैं सारे वन्य जीव
कहां गए वह मासूम परिंदे
जो देख उन्हें मारे खुशी के
उछल पड़ते पढ़ते थे
करते थे अठखेलियाँ फिर
कर कैद उन्हें मोबाइल में
संग अपने लिए जाते थे |

आहत हैं
वह बंदर
किसके लिए मारे उछाल
कौन है जो देख उसे पीटेगा तालियाँ
मदमस्त हाथी सोच रहा है
किसके लिए झूँमू
दहाडू किसके लिए, सोच रहा शेर
वक्त लिखेगा, इंसान और जानवर के बीच की
यह अद्भुत कहानी

बताएगा वक्त
देखा है उसने वह दौर
मंदिरों में नहीं उमड़ा
भक्तों का कोई रेला
बस ख़ामोशी ही करती थी शंखनाद
इंतजार रहता था
भगवान को भी भक्तों का
भगवान भी बैठे रहे आस में
कैसे करें भक्ति का श्रंगार
खाली है उनका दरबार
कभी देखा नहीं दृश्य ऐसा विकराल
बंद रहे शिवालय
खुले रहे मदिरालय
वक्त लिखेगा इसका भी इतिहास

इन्सान मगर सहमा सा
कैद हो रह गया था चारदीवारी में
साँसों पर लग गया था पहरा
अजीब सी बेचैनी थी
भविष्य का हर सपना
धराशाई होता दिखाई दे रहा था
लगा वक्त कितना
लौटने जिंदगी को पुनः पटरी पर
आई कैसे लुप्त मुस्कान होठों पर
कैसे हुई खड़ी
लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था
बताएगा वक्त इसका भी इतिहास

इन सबके बीच अगर
कोई खुश था तो
चांदनी, चांद, सितारे,
इठला रहे थे नहरें,झील, तालाब,
नहाया सा लगते थे पर्वत ,आसमान

खुश हो कूक उठी थी कोयल
चहक रही थी गौरैया
धूली-धूली सी थी हवा,
मुस्कुरा रही थी
गंगा, जमना ,सरस्वती,
करती थी संगम पर अठखेलियाँ
गूँज रहा था हिमालय का
जय घोष |

वक्त सुनाएगा वह किस्से
कैसे हारकर सबको
क्यों कर लौट जाना पड़ा
रामायण , महाभारत काल में
यह संकेत था प्रकृति का
पूज्या पृथ्वी को
भोग्या समझने की
कितनी बड़ी कीमत चुकाई थी
इंसान ने
भविष्य ले सके सबक
अतीत से
वक्त समझाएगा भविष्य को
इतिहास के बहाने
प्रकृति से करके खिलवाड़
कितना पछताया आया है इंसान
बतायेगा वक्त |
सहेजकर ही प्रकृति को
सुखी रह सकता है इन्सान
खुद को सिकन्दर समझने वालों को
दिखलायेगा
वक्त मंजर वो सभी
कैसे…कैसे लाखों करोड़ों रुपए
तिजोरी में रह गए दफन
और दम्भ भरने वाले दौलत का
हो गये दफन 2 गज जमीन में|

वक्त बतायेगा
अमेरिका ,चीन, जापान,पेरिस
घुटने टेक गये हैं
सभी देशों ने विश्व के
मगर लड़ता रहा भारत यह महायुध्द
कुछ बात तो है
हस्ती मिटती नहीं हमारी
इसलिए है विश्वास वक्त को
देश होगा खड़ा फिर से
जीतकर कोरोना महायुध्द
वक्त लिखेगा, वक्त लिखेगा
उनका भी इतिहास ,
देखा है वह दौर मैंने |
लिखेगा पत्थर पर वक्त यह इतिहास
ताकि भविष्य ले सके सबक
न हो कभी फिर ऐसा महायुध्द |
डॉ. लता अग्रवाल

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